Saturday, November 8, 2008

अपना अपना nazariya

दो mitra बैठे batiya रहे थे। दोनों ही मित्रों की लड़कियां शादी की उम्र को हो गई थी। दोनों ही पढ़ी-लिखी तथा सुंदर थी, किंतु काफी खोजबीन के बावजूद योग्य वर नही मिल प् रहे थे। इस पर पहले मित्द्र का कथन था लड़की का बाप होना एक प्रकार की लानत हैं। इतनी पद्लिख गई है फिर भी शादी तय नही हो प् रही है। रिश्ते की बात लेकर कहाँ-कहाँ नही गया मैं। क्या-क्या नही किया, किंतु चार sal हो रहें हैं, कही बात बन ही नही रही। कभी वर जमता है, तो घर नही, कहीं घर जमा तो वर नही। कही दोनों जमते हैं, तो उनको कुच्छ शर्ते ऐसी hओटी हैं जो लड़की को नागवार गुजरती हैं। sअमझ में नही आता क्या किया जाए। यही सब सोच-सोच कर ए दिन मेरा बलुद प्रेशर हाई हो जाता हैं।

इस पर दुसरे मित्र का कथन था, लड़की को पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा कर दिया है। आज अच्छी नौकरी मैं है, उसका भविष्य ujjwal है। शादी का क्या, आज नही तो कल हो ही jayegi। Jodiyan तो ऊपर से bankar अति है, इसलिए कोई न कोई रास्ता तो niklega ही। पता नही, अपने घर जाकर उसे किन-किन बन्धनों में रहना पड़े। तब तक अपनी साड़ी इच्छाएं, अकन्षाएं पुरी कर ले जिससे अगर बाद में उसे पुरा न किया जा सके, तो उसका गम तो न रहें.

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