Friday, March 27, 2020

Shiksha Dushit ya Pradushit

शिक्षा दुषित या प्रदूषित 

आज इस बात पर चर्चा आम हो गई है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली दूषित है।  इस संदर्भ में समाचार पत्रों में तो आये दिन विचार अभिव्यक्त होते ही रहते हैं, जैसे - 'शिक्षा के क्षेत्र में आई कमियों के सुधार हेतु शासन ने अभिनव योजनाएं लागू की हैं',  'शिक्षा परिसरों के माहौल में सुधार के लिए कदम उठाए जा रहे हैं, ऐसे ही कई अन्य वक्तव्य एवं विचार पढ़ने को मिल जाएंगे। ऐसा नहीं है कि इस संदर्भ में कुछ प्रयास नहीं किए गए।  कई आयोग बिठाए गए, साथी ही कई समितियों का भी गठन अब तक किया जा चुका हैं।  लेकिन परिणाम क्या रहें ? वही ढाक के तीन पात, क्योंकि जब समितियों के सुझावों को ही अनसुना कर दिया जाता है तो लागू करने की सक्रियता के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता। इस बात पर तो सभी सहमत होंगे कि बच्चा माँ के पेट से कुछ भी सीख कर नहीं आता है। नित्य कर्म से लेकर राष्ट्र की बागडोर संभालने तक की सारी शिक्षा बालक को उसके माता-पिता तथा गुरु के साथ चारों तरफ व्याप्त वातावरण से ही प्राप्त होती है। 

बालक जीवन का प्रथम पाठ परिवार में रहकर ही सीखता है। इसके पश्चात आता है विद्यालय, जहां बालक को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार तथा व्यावहारिकता का मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है।  यह सब शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक तथा शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी दोनों ही के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है।  इस बात की पुष्टि के लिए रामायण तथा महाभारतकालीन गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करना यहाँ प्रासंगिक होगा। 

हमारे यहाँ पर जहां गुरु वशिष्ठ जैसे शांतिप्रिय, त्यागी और ज्ञानी महर्षि थे तो गुरु विश्वामित्र के समान अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए संस्कारित करने वाले विद्वत्त भी थे।  इन दोनों के सान्निध्य में रहने से राम के रूप में भारतीय जनमानस में एक ऐसे देवता का जन्म हुआ जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये, जिन्होंने राजपाट को ठुकराकर वनवासी जीवन को स्वीकारा तथा असुरी शक्तियों के विनाश में अपना जीवन समर्पित कर दिया। 

दूसरी तरफ द्रोणाचार्य जैसे शिक्षक (गुरु) थे, जिन्होंने अपने शिष्य अर्जुन को अपराजेय  धनुर्धर बनाने के लिए एकलव्य जैसे निष्ठावान शिष्य का अंगूठा कटवा दिया।  इस निष्ठाहनन का प्रभाव निश्चित रूप से द्रोणाचार्य के अन्य शिष्यों पर भी पड़ा, जिसका परिणाम यह रहा कि वह एक दूसरे का सिर काटने के लिए उद्धत हो गये।  पितामह भीष्म को भी बाणों से भेद दिया गया।  स्वयं द्रोणाचार्य का भी सिर काट दिया गया था। 

इसी प्रकार सिकंदर में असीम साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति के संस्कार उनके गुरु सुकरात और अरस्तु द्वारा प्रदान किए गए थे, तो वीर शिवाजी में साहस के संस्कार उनके गुरु रामदास ने प्रवाहित किए थे।  आधुनिक संदर्भ में गांधीजी के गुरु गोखले थे तो नेहरूजी अपना गुरु गांधीजी को मानते थे।  इनके जीवन का मूल्यांकन करें तो हमें गुरुओं की विद्वत्ता में शिष्यों की सफलता दिखाई देती है। 

ऐसे में वर्तमान समय की अगर बात की जाये तो गुरुओं की वह श्रेष्ठता तथा चरित्रगत दृढ़ता कम ही परिलक्षित हो रही है।  आज उद्देश्यों में भटकाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। वर्तमान समय में उद्देश्यों की प्रेरणा नहीं अपितु कर्ज की अदायगी महत्वपूर्ण हो गई है। छात्रों में प्रेरक मार्गदर्शन का अभाव होता जा रहा है।  फलस्वरूप, आदर्श व्यक्तियों के प्रेरक प्रसंग, सुंदर और प्रेरणाप्रद काव्य छात्रों की सोच में परिवर्तन लाने या कहें दिशा देने में असफल हो रहे हैं। यही वज़ह है शायद की आज छात्र महापुरुषों की जयंती पर काव्यपाठ, महत्वपूर्ण विषयों पर भाषण प्रतियोगिता अथवा समसामयिक मुद्दों पर आयोजित होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में दिलचस्पी नहीं लेते हैं। उन्हें पसंद आते हैं फिल्मी गानों पर आधारित अंताक्षरी कार्यक्रम, फैशन शो या फिर एक मिनट में जैसे सतही कार्यक्रम।  छात्रों की इस रुची में परिवर्तन लाना आवश्यक है।  इसके लिए प्रयास भी शिक्षक को ही करने होंगे। 

ऐसा नहीं है कि आज का शिक्षक समुदाय नाकारा है या कर्तव्यनिष्ठ नहीं है।  आज भी आदर्श शिक्षक मौजूद है, जो छात्रों की योग्यता को तराशने में गर्व का अनुभव करते हैं, गुरु-शिष्य की गौरवशाली परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं और निस्वार्थ शिक्षा प्रदान करने में भी हमेशा तत्पर रहते हैं। किंतु प्रश्न यह उठता है की कितने हैं ऐसे। 

अब इस उपयुक्त विस्तृत विवेचन के पश्चात निष्कर्षतः इस बात पर विचार किया जा सकता है कि शिक्षा की बिगड़ी व्यवस्था के लिए आमूल परिवर्तन क्या हो सकते हैं, इसे कैसे प्रदूषण मुक्त किया जा सकता है।  उसके लिए अध्यापक के चयन से लेकर विषय निर्धारण तक का सारा कार्य योग्यता, चरित्र और मूल्यों की कसौटी पर कसा जाना चाहिए।  राजनीतिक हस्तक्षेप समाप्त करके, विद्यालय प्रांगण को सिर्फ प्रमाण पत्र और उपाधी बांटने की संस्था की बजाए चरित्र, नैतिकता और योग्यता से संपन्न, सुयोग्य नागरिक तैयार करने का गौरवशाली केंद्र बनाया जाना चाहिए। 

स्वाभाविक रूप से यह आज की नितांत आवश्यकता है, जिस पर अमल कर हम भविष्य के लिए गाँधी, विवेकानंद, बोस जैसे राष्ट्रनायक तैयार कर सकेंगे।  वरना तो हमारे सामने भूत और भविष्य के वास्तविक और काल्पनिक स्वप्न के बीच जो चित्र उपस्थित हो रहा है, वह कोई बहुत अच्छी तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर रहा है। क्योंकि आज जो शिष्य नागरिक बनने की ओर अग्रसर है, वह संवेदनाओं से रहित, नैतिकता से दूर और व्यावहारिकता से अनभिज्ञ एक ऐसा वर्ग तैयार हो रहा है जिसे येन-केन प्रकरेण धन अर्जित कर सम्पन्न बनना है।  इसे रोकना होगा। 

सही मार्गदर्शन आज की युवा पीढ़ी को शिक्षा के माध्यम से ही देना होगा, जिससे उनकी सोच में परिवर्तन लाया जा सके, वरना तो दूषित सोच और प्रदूषित वातावरण के चलते हमारे गौरवशाली अतीत को मिटते देर नहीं लगेगी।

डॉ.मोहिनी नेवासकर 
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